ईश्वर से प्रेम कैसे किया जाता है

ईश्वर से प्रेम कैसे किया जाता है – Pandit Pradeep Mishra

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ईश्वर से प्रेम कैसे किया जाता है | Pandit Pradeep Mishra Sehore Wale

शिव महापुराण और रूद्र पुराणपुराण में कई बार वर्णन आता है कि किस प्रकार भक्तों ने भगवान को प्रेम के वश में किया।

जो भक्त भगवान से निश्चल प्रेम करता है वह या जानता है कि भगवान को किसी भी प्रकार की धन वैभव प्रसिद्धि की आवश्यकता नहीं है परंतु वह हमसे केवल और केवल प्रेम की मांग करते हैं।

उपनिषदों में तो जहां तक वर्णन आता है कि जब भक्त केवल भगवान की मांग करता है तो भगवान स्वयं अचंभित होते हैं, भगवान उसके सामने कई लालसा रखते हैं जिस प्रकार से धन की संपदा की वैभव की सुंदरी की यहां तक कि मोक्ष की भी लालसा भक्तों को देते हैं।

परंतु जब भक्त अपनी बात पर अड़ा रहता है और केवल अपने आराध्य को चाहता है तब आराध्य भी प्रसन्न होकर भक्तों को निश्चल प्रेम प्रदान करते हैं।

उदाहरण के तौर पर ही देख लीजिए किस प्रकार सती ने अपनी निश्चल प्रेम और भक्ति से शिव को वश में कर लिया।

यहां तक कि रूद्र पुराण में भी या वर्णन आता है कि जो भी इस कथा का श्रवण करता है श्रवण मात्र से उसके सारे पापों का अंत हो जाता है।

कथा आरंभ होती है ब्रह्मा के पुत्र दक्ष प्रजापति से जो अपनी अर्धांगिनी के साथ मां पराशक्ति की घणगोर तपस्या करते हैं

मां पराशक्ति प्रसन्न होकर दक्ष प्रजापति से कहती है कि पुत्र मांगो क्या वर मांगते हो , दक्ष प्रजापति यह वर मांगते हैं कि वह उन्हें पुत्री रूप में प्राप्त हो।

इस प्रकार दक्ष प्रजापति के घर में माता सती का आगमन होता है बचपन से ही माता सती को धन वैभव से किसी प्रकार का मोह नहीं रहता और वह शिवलिंग की पूजा अर्चना में व्यस्त रहती थी 1 दिन माता सती यह निश्चय करती है कि वह भवन में जाकर भगवान शिव की घनघोर तपस्या करेंगी।

माता सती अन्य चल का त्याग कर देती है और तपस्या से प्रसन्न होकर शिव उन्हें वर मांगने को कहते हैं।

तब माता सती शिव से यह आग्रह करती है कि वह उन्हें पति रूप में स्वीकार करें ।

इस विवाह से उनके पिता दक्ष प्रजापति प्रसन्न नहीं होते, और माता सती दुखी मन से या निश्चय करती है कि वह कैलाश में शिव के साथ निवास करेंगी।

एक दिवस उन्हें पता चलता है कि उनके पिता दक्ष प्रजापति यज्ञ की तैयारियां कर रहे हैं, परंतु शिव सती से कहते हैं कि जहां पर निमंत्रण नहीं दिया जाए वहां पर जाना उचित नहीं सकती इस बात को ना मानकर पिता के वहां जाती है

वहां पर उनके पिता शिव का बहुत अधिक अपमान करते हैं इस अपमान को सुनकर सती यह निश्चय करती है कि वह अग्नि में प्रवेश कर जाए।

जब यह खबर कैलाश में शिव को पता चलती है तो वह क्रोधित हो उठते हैं, और अपने जटाओं के गुच्छे में से दो जटाए धरती पर पर कुत्तेहैं जिससे पहली जटा से रुद्र अवतार वीरभद्र का आगमन होता है और दूसरी जटा से भद्रकाली का, इसके साथ साथ आठ अन्य देवियों का भी आगमन होता है जैसे चामुंडी ,भद्रकाली ,कात्यानी ,वैष्णवी आदि जो प्रलय के समय वीरभद्र और माता काली की सहायता करती है।

वीरभद्र और भद्रकाली समूचे सेना का विनाश कर दक्ष प्रजापति का गला सर से अलग कर देती है, परंतु जब शिव का रूद्र रूप शांत होता है तो वह यज्ञ स्थान पर जाने का निश्चय करते हैं।

जैसा कि पुराणों में कहा गया है कि भक्त जितना भगवान से प्रेम करते हैं उससे कहीं गुना अधिक भगवान भक्तों से प्रेम करते हैं, शिव यह जानते थे कि पति को अपने पिता से बहुत अधिक प्रेम था इसलिए वह उनके पिता को पुनर जीवित करते हैं, और कटे हुए सर की जगह बकरी का सर लगाते हैं।

यह कथा हमें सिखाती है कि किस प्रकार से भगवान को वश में करने के लिए भक्तों का प्रेम ही एकमात्र सहारा है।

यहां तक कि भगवान श्रीकृष्ण भी दुर्योधन के छप्पन भोग को को छोड़कर विधु रानी के सादे भोजन को स्वीकार करते हैं क्योंकि विधु रानी ने जो इस भोजन में प्रेम मिलाया है, श्री कृष्ण कहते हैं कि इसके आगे तो पूरे ब्रह्मांड का भोज भी कमतर है या तुच्छ है |

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