क्यों शिव को कहा जाता है देवादि देव महादेव

क्यों शिव को कहा जाता है देवादि देव महादेव

Posted by

क्यों शिव को कहा जाता है देवादि देव महादेव?

अक्सर यह प्रश्न आता है कि क्यों महादेव को सभी देवों में सबसे सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है।

रूद्र पुराण और शिव महापुराण के अनुसार 33 कोटि देवी देवताओं में महादेव का स्थान सर्वप्रथम है।

यहां तक कि भगवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण स्वयं यह कहते हैं कि वह स्वयं सभी देवताओं में श्रेष्ठ महादेव है।

इसका अर्थ कतई यह नहीं है कि श्री कृष्ण और महादेव एक है परंतु शास्त्रों के अनुसार महादेव श्री कृष्ण के अनुसार अंश अवतार है । श्रीमद्भागवत हम और शिव महापुराण में भी यह उल्लेख आता है कि शिव स्वयं परम वैष्णव है।

और यह भी एक कारण है कि वह सभी देवताओं में सबसे अधिक पूजनीय है।

जिस प्रकार से हम जानते हैं कि ब्रह्मा का निवास ब्रह्मलोक में है विष्णु का निवास विष्णु लोक या बैकुंठ में है।

ठीक उसी प्रकार महादेव का निवास इस धरा अर्थात पृथ्वी पर है जिसे मृत्यु लोग भी कहा जाता है।

रुद्रपुराण में महादेव को इस पृथ्वी का पालनहार भी कहा गया है जो अपने भक्तों को न केवल भौतिक सुख प्रदान करते हैं अपितु जब भी उन्हें मानसिक और आध्यात्मिक संकट का सामना करना पड़ता है तो वह स्वयं उस कष्ट का निवारण भी करते हैं।

पुराणों में वर्णन आता है कि महादेव का निवास कैलाश पर्वत है परंतु जो पुराणों के मर्म को जानता है उसे यह ज्ञात है कि शिव का निवास केवल कैलाश पर्वत नहीं है अपितु सभी 12 ज्योतिर्लिंग और रूद्र पुराण के अनुसार तो कण-कण में शंकर बसे है।

पुराणों में बहुत ही सुंदर वर्णन आता है कि किस प्रकार शिव की उपासना करने से और शिव के आशीर्वाद से नव ग्रहों को देवताओं का स्थान प्राप्त हुआ।

पुराणों में यह स्पष्ट वर्णन है कि किस प्रकार नवग्रहों ने शिव को प्रसन्न करने के लिए कड़ी तपस्या करें और जब शिव प्रसन्न हुए तो उन्हें देवताओं के समक्ष एक विशेष दर्जा प्राप्त करवाया, शिव को ऐसे ही भोला भंडारी नहीं कहा जाता, जिस प्रकार एक मां की ममता अपने बच्चे के लिए कभी कम नहीं होती ठीक उसी प्रकार शिव जिस पर प्रसन्न हो जाए

उसका सौभाग्य तो स्वयं देवता भी वर्णन नहीं कर सकते।

शिव ने प्रसन्न होकर नव ग्रहों को देवताओं का दर्जा प्राप्त करवाया और उन्हें यह भी आशीर्वाद की दिया कि यज्ञ में देवताओं या नव ग्रहों को भी आहुति देना आवश्यक होगा,

किसी भी घर में कुल में या समाज में कोई भी सुख या दुख का कार्य कलाप हो तो नवग्रहों को पूछना अति आवश्यक है।

रामायण में भी कई बार यह वर्णन आता है कि किस प्रकार रावण ने नव ग्रहों को अपने पैर के नीचे कुचल कर रखा था, उस समय नव ग्रहों को भी अज्ञात था कि इस समस्या से केवल शिव ही निवारण कर सकते हैं क्योंकि शिव परम वैष्णव है और जब कभी भी परम वैष्णव परम भक्त अर्थात शिव अपने इष्ट राम से यह आग्रह करेंगे कि वह जल्द से जल्द रावण का अंत करें तो तो श्रीराम भी अपने भक्तों को आनंद प्रदान करने के लिए यह कार्य अतिशीघ्र करने के लिए आतुर होंगे।

पुराणों में एक और बार वर्णन आता है कि किस प्रकार जब शुक्र के ह्रदय में दुख का आगमन हुआ और वह गंभीर दुख के कारण व्याकुल हो उठे तो उन्होंने शंकर की शरण लेकर या शंकर के सामने पूर्ण शरणागति होकर उनसे यह प्रार्थना करें कि हे भोले भंडारी इस दुख को मिटा कर कृपया मेरे ह्रदय में आप के प्रति प्रेम उत्पन्न करवा दीजिए।

तब शिव ने शुक्र की पीड़ा जानकर उसे परम आनंद की प्राप्ति करवाई, और एक लीला के द्वारा यह स्पष्ट किया कि जो भी भक्त शिव को ह्रदय से पुकारता है तो शिव भागे भागे उसकी सहायता करने आ जाते हैं।

रामायण में भी वर्णन आता है कि किस प्रकार समुद्र को पार करने के पूर्व श्री राम ने शिव की आराधना करने के लिए ज्योतिर्लिंग का निर्माण किया और वह रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। क्योंकि स्वयं परम ब्रह्म भगवान श्री राम जी यह जानते हैं कि जब वह इस धरा धरती पर आते हैं तो वह इस लीला के माध्यम से यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि इस पृथ्वी के दुखों का निवारण शिव ही कर सकते हैं।

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के स्थापित होने के बाद एक बहुत ही सुंदर प्रसंग आता है जिसमें यह स्पष्ट होता है कि किस प्रकार श्रीराम को शिव बहुत अधिक प्रिय है और किस प्रकार शिव श्रीराम को प्रिय है।

रामायण में भी है वर्णन आता है कि एक बार जब पार्वती माता शिव से यह प्रश्न पूछती है कि आप योगा ध्यान में किसका ध्यान करते हैं उस समय शिव बहुत ही सुंदर उत्तर देते हैं शिव कहते हैं कि मेरा ह्रदय और मेरे चिन्मय शरीर का कण-कण राम नाम के भजन में मग्न रहता है।

इसलिए रूद्र पुराण और शिव महापुराण में यह स्पष्ट है कि अगर भक्त शिव को अपने वश में करना चाहते हैं तो तो शिव को वश में केवल एक ही पाश से किया जाता है और वह है प्रेम पाश, क्योंकि जब भी प्रेम का संबंध स्थापित होता है, तो वह बहुत पवित्र और निर्मल होता है क्योंकि उसमें किसी भी प्रकार के छल ,ईर्ष्या ,लोभ ,लालच का निवास नहीं होता।

अगर आपको यह लेख पसंद आया तो इसे ज्यादा से ज्यादा लोगो को शेयर करे।

यह भी पढ़े:

श्री शिवाय नमस्तुभ्यं मंत्र की महिमा

पंडित प्रदीप जी मिश्रा का जीवन परिचय

कावड़ के जल से ये उपाय जरूर करें

भोले बाबा से हमें क्या प्रार्थना करना चाहिए

शीतला सप्तमी पर भूल के भी ना करे ये काम

|| श्री शिवाय नमस्तुभ्यं ||

श्री शिवाय नमस्तुभ्यं

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *