सावन मास की महिमा

सावन मास की महिमा – पंडित प्रदीप मिश्रा

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सावन मास की महिमा. सब से पूर्व सभी शिव भक्तों को सावन की हार्दिक हार्दिक शुभेच्छा.

जिस प्रकार से हम जानते हैं कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए कोई ना कोई सा विशेष दिन वर्ष में, महीने में अवश्य आता है. उदाहरण के तौर पर अगर हमने तो मनुष्य समाज में भी मनुष्य का जन्म दिवस को विशेष तौर पर बल दिया जाता है.

सावन मास की महिमा

यहां तक कि श्रीमद्भागवतम में भी है कहा गया है कि श्रीहरि अर्थात कृष्ण को एकादशी बहुत ही अधिक प्रिय है.

इस दिवस पर जो भक्त विशेष उपवास करता है उस पर प्रभु की विशेष कृपा होती है.

यहां तक कि पुराणों में यह भी पढ़ने आता है कि जो मनुष्य एकादशी का पालन मात्र एक बार श्रद्धा पूर्वक कर लेता है उसे कभी भी नर्क के दर्शन नहीं होते और वह बैकुंठ को प्राप्त होता है.

ठीक उसी प्रकार की महिमा सावन मास की भी है.

जिस प्रकार से मात्र एक एकादशी करने से मनुष्य को 10,000 से ज्यादा गायों को दान करने का, एक हजार से ज्यादा अश्वमेध यज्ञ करने का , और सैकड़ों मन अनाज ,चांदी सोना दान करने का फल मिलता है ठीक उसी प्रकार की महिमा भी सावन की है.

जिस प्रकार से हम जानते हैं कि शिव पुराण और रूद्र पुराण में भी कई बार यह वर्णन आया है कि सावन के समय हमें महादेव का अभिषेक दो कलशो से करना चाहिए.

सावन में चढ़ाया हुआ एक बेलपत्र महादेव को वह फल प्रदान करता है जो समस्त एक वर्ष में प्राप्त हो.

यहां तक कि पूरे देश भर में 12 ज्योतिर्लिंगों का महत्व भी इस शुभ अवसर पर बढ़ जाता है क्योंकि इन ज्योतिर्लिंग को पर महादेव के दर्शन करने मात्र से मनुष्य के सारे पाप कर्म शून्य हो जाते हैं , उसे महादेव की अनन्य भक्ति प्राप्त होती है और यहां तक कि वह महादेव से प्रेममई संबंध स्थापित करता है.

हम सबके अपने मन में यह प्रश्न कई बार आता है कि जब हम छोटे थे तो हमारे माता-पिता श्रावण के मास में ही शिव जी के दर्शन कराने हमें मंदिर रोजाना क्यों ले जाते थे.

परंतु इस कंद पुराण में इसका स्पष्ट वर्णन है कि जो मनुष्य सावन के मांस में प्रतिदिन 12 ज्योतिर्लिंग चाहे वह उसके नगर में ही कहीं पर स्थापित हो अगर उसके दर्शन मात्र कर लेता है तो महादेव स्वयं माता पार्वती और गणेश जी के साथ उसके सारे दुख हरने के लिए उसके समक्ष आते हैं.

बहुत बार भक्तों का यह प्रश्न होता है कि सावन के महीने में ही क्यों हम दो कलशो से भगवान का अभिषेक करते हैं.

शिव पुराण में इसकी बहुत ही सुंदर कथा आती है जिसमें यह उल्लेख आता है कि जब गंगा धरती पर आने वाली होती है तो उसके पूर्व गंगा मां शिव जी से प्रश्न पूछती है कि पार्वती के होने पर भी आप मेरा आह्वान क्यों कर रहे हैं.

जब शिवजी मां गंगा से कहते हैं कि पृथ्वी के भार को मुझे ग्रहण करना है इसके लिए मुझे गंगा और पार्वती दोनों की आवश्यकता है , इसलिए यह कारण है कि जब भक्त दो कलशो में शिवलिंग का अभिषेक करते हैं तो एक कलश में स्वयं माता गंगा और दूसरे में पार्वती विराजमान होती है.

सावन मास महीने में सभी भक्तों को यह विशेष तौर पर याद रखना चाहिए कि जब शिवलिंग की पूजा अर्चना करने के बाद वह मंदिर के बाहर निकले तो भक्तों के मन में यह संवाद नहीं आना चाहिए कि मैं हूं तो शिव की सेवा हो रही है, घर की तरफ जाते जाते शिव को पलट कर एक बार अवश्य देखें और मन में यह प्रार्थना करें कि हे शिव मात्र आपकी कृपा से और गुरुजनों की कृपा से मुझे यह सेवा प्राप्त हुई है और आप कृपा करेंगे तो ही मुझे सेवा का या वरदान प्राप्त होगा और यह सेवा कृपया मुझसे ना ले.

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