शिव को किस प्रकार प्रसन्न करें

शिव को किस प्रकार प्रसन्न करें

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चाहे मनुष्य को किसी भी प्रकार की समस्या हो चाहे वह भौतिक समस्या हो या आध्यात्मिक समस्या शिव महापुराण के अनुसार अगर एक बार शिव को प्रसन्न कर दिया जाए तो वह न केवल हमारी सभी भौतिक इच्छाएं पूरी करते हैं अपितु हमें वह आध्यात्मिक सुख और आनंद की प्राप्ति करवाते हैं जो देवताओं और गंधर्व को भी नहीं प्राप्त होती।

जिस प्रकार से शिव महापुराण में वर्णन आता है कि जहां कहीं भी शिव महिमा गाई जाती है वह न केवल स्वयं सोमेश्वर महादेव उपस्थित होते हैं अपितु वह कथावाचक के द्वारा अपनी महिमा का गान करवाते हैं स्वयं सोमेश्वर महादेव उस कथा को श्रवण कर आनंदित भी होते हैं परंतु शिव सबसे अधिक प्रसन्न तब होते हैं जब उन्हें ज्ञात होता है कि उनके भक्तों ने कितने अथक प्रयासों द्वारा उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश करी है, चाहे बस शिवपुराण हो या रूद्र पुराण उसमें यह वर्णन आता है कि भगवान को केवल भक्त ही वश में कर सकते हैं इसका अर्थ यह नहीं होता कि भक्तों के पास कोई माया पाश या कोई अन्य प्रकार का पाश है।

भगवान तो केवल भक्तों के निश्चल प्रेम में ही बंधे जाते हैं।

शिव महापुराण में वर्णन आता है कि क्यों हर कंकर में शंकर बसते हैं क्योंकि मूल रूप से देखा जाए तो हर कंकर में शिव विराजमान तो है, परंतु जब कोई कंकड़ कोई भक्तों द्वारा उठाया जाता है और उसके मनोभाव में या भावना आती है कि इसमें स्वयं जी विराजमान है, तो उस भक्तों का निश्चल प्रेम देखकर शिव स्वयं उस में प्रकट हो जाते हैं।

शिव को कृपा का सिंधु इसलिए भी कहते हैं क्योंकि शिव पुराण के अनुसार हम यह जानते हैं कि शिव की पूजा अर्चना में हमें पुष्प , बेलपत्र ,प्रसादम ,चावल ,दाल ,जल आदि की आवश्यकता भी पड़ती है परंतु अगर कोई भक्तों के पास इतने सारे साधन ना होकर भी वह केवल भक्ति भाव से शिव को शिवलिंग पर जल अर्पित करता है तो मात्र केवल एक ही कर्म से शिव प्रसन्न हो जाते हैं।

शिव महापुराण में ऐसी कई कथाएं आती है जहां पर वर्णन आता है कि स्वयं शिव संकेत करते हैं कि वह अपने भक्तों पर क्यों पसंद नहीं हो पाते हैं।

उदाहरण के तौर पर बहुत बार यह देखा जाता है कि जो भक्त भक्ति भाव से शिव की अर्चना कर रहा है परंतु फिर भी शिव प्रसन्न इसलिए नहीं होते क्योंकि उनके पित्र उनसे खुश नहीं है। किस प्रकार से शिव सभी मनुष्यों के पालनहार है और इस भौतिक दुनिया में पिता का दर्जा रखते हैं, ठीक उसी प्रकार जिन पित्रों के आशीर्वाद द्वारा वंश आगे बढ़ रहा है अगर वही खुश नहीं होंगे तो शिव कैसे प्रसन्न होंगे।

बहुत बार शिव संकेत करते हैं कि यदि किसी परिवार में दरिद्रता है ,रोगों की समस्या है ध, वैभव की कमी है तो हो सकता है कि उस के मुखिया ने पितरों को खुश करने का कोई उपाय नहीं किया।

शिव महापुराण के अनुसार यह कार्य बहुत ही सुगम है अगर यह भी मान ले की परिवार को ज्यादा विधि विधानो का ज्ञान नहीं है तो मात्र श्राद्ध पक्ष में कोई सा भी पत्र या पत्ता लेकर

उसमें पूरी सब्जी और एक मीठा व्यंजन परोस कर पीपल के पेड़ के नीचे रख कर दिया लगाकर पितरों को याद करके उसे अर्पित करें। मात्र केवल यह उपाय करके ही पित्र खुश हो जाते हैं।

शिव महापुराण और रूद्र पुराण में कई बार वर्णन आता है कि शिव अपने भक्तों की परीक्षा भी लेते हैं परंतु हम यह जानते हैं कि अगर हमें दही में से मक्खन निकालना है तो हमें उससे अच्छे से मथना होगा। ठीक उसी प्रकार से शिव उनके भक्तों को यह सामर्थ्य भी देते हैं कि वह हर परीक्षा में उत्तीर्ण होकर शिव को प्रसन्न कर पाए।

और इसका मुख्य उद्देश्य तो यह भी है कि हम शिव के साथ प्रेम संबंध स्थापित कर सके।

जिस प्रकार से एक प्रेमी अपनी प्रेमिका के विचारों में हमेशा मगन रहता है ठीक उसी प्रकार भक्त भी भगवान की सुंदर दिलाओ का स्मरण करते हुए और उनका नाम जप करते हुए सदैव उनकी भक्ति और प्रेम उमंग में लीन रहता है।

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