श्री शिवाय नमस्तुभ्यं मंत्र की महिमा

श्री शिवाय नमस्तुभ्यं मंत्र की महिमा

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शिव महापुराण के अनुसार अगर संपूर्ण विश्व में जो सारी समस्याओं का हल कर दें तो वह केवल एक ही मंत्र है

“श्री शिवाय नमस्तुभ्यं”

शिवपुराण में भी यह वर्णन है कि यह शिवजी का मूल मंत्र है।

श्री शिवाय नमस्तुभ्यं मंत्र की महिमा पंडित प्रदीप मिश्रा

शिव पुराण के अनुसार अगर कोई भक्त एक हजार बार शिव मृत्युंजय मंत्र का जप करें और एक बार मात्र श्री शिवाय नमस्तुभ्यं का जाप करें तो उसका फल समान रूप से प्राप्त होगा. यह इसकी प्रबलता का प्रमाण है।

श्री शिवाय नमस्तुभ्यं

अगर जीवन में किसी भी प्रकार की समस्या हो चाहे वह धन से, मन से, या तन के कारण हो तो उसका एकमात्र उपाय केवल इस महामंत्र का जप है।

उदाहरण के तौर पर अगर किसी व्यक्ति को एकदम से दिल की बीमारी या वह बेहोश हो जाए तो एक कलश में जल भरकर उसमें रुद्राक्ष डालकर सिर्फ श्री शिवाय नमस्तुभ्यं का जप करना है और उस जल को पीड़ित व्यक्ति को पिलाना है इस मंत्र का इतना प्रभाव है कि वह उस व्यक्ति को तुरंत क्षण चेतना में ले आएगा।

जिस प्रकार से हम सब जानते हैं कि महादेव को प्रसन्न करने के लिए हमें अत्यधिक धन वैभव की आवश्यकता नहीं है परंतु हमें केवल उन्हें प्रेम के वश में करना है और यदि सत्यता में हम उनसे प्रेम का संबंध स्थापित करना चाहते हैं तो हमें उनके ह्रदय में अपने लिए एक विशेष स्थान बनाना होगा।

जिस प्रकार एक कुम्हार को बड़ा बनाने के लिए मिट्टी अत्यधिक आवश्यक है उसी प्रकार अगर कोई भक्त महादेव को प्रसन्न करना चाहता है उनका प्रेम पाना चाहता है और उनके ह्रदय में स्थान प्राप्त करना चाहता है तो उसका केवल एक ही मार्ग है श्री शिवाय नमस्तुभ्यं का जप।

यहां तक कि लिंग पुराण में भी वर्णन है कि अगर ब्रह्मांड के 33 कोटि देवी देवताओं को अगर शिव को प्रसन्न करना है तो वह भी श्री शिवाय नमस्तुभ्यं का जप करके शिव को प्रसन्न करते हैं, लिंग पुराण में यह भी वर्णन है कि जब देवताओं और दानवों का युद्ध होता है तो श्री शिवाय नमस्तुभ्यं देवताओं को शक्ति प्रदान करता है।

अगर कलयुग की बात की जाए तो चाहे कोई सी भी समस्या हो वह समस्या चाहे बिजनेस से या जॉब से संबंधित हो पढ़ाई से संबंधित हो शरीर से संबंधित हो मन से संबंधित हो या या किसी और विषय से संबंधित हो तो उसका केवल एक ही निवारण है श्री शिवाय नमस्तुभ्यं का जप।

जिस प्रकार लक्ष्मण जी को शक्ति बाण लगने पर हनुमान जी ने हिमालय का सफर तय कर संजीवनी बूटी को लाकर लक्ष्मण जी को पुनः चेतना में लौट आया था ठीक उसी प्रकार अगर हमें कलयुग में हमारी सही चेतना को प्राप्त करना है तो वह केवल श्री शिवाय नमस्तुभ्यं के जप से ही संभव है।

श्री शिवाय नमस्तुभ्यं के जबसे तो स्वयं सरस्वती भी प्रसन्न होती है और वह विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करती है, उदाहरण के तौर पर अगर आप परीक्षा देने के लिए जा रहे हैं तो एक चावल अपने हाथ में रखकर श्री शिवाय नमस्तुभ्यं का जप करके परीक्षा देने जावे 1 दाने चावल का इतना महत्व होगा कि वह परीक्षा में आपकी चेतना को स्थिर रखकर आपको सफलता की ओर अग्रसर करेगा।

अनेक पुराणों में उदाहरण के तौर पर शिव पुराण लिंग पुराण स्कंद पुराण और आदि भक्ति ग्रंथों में हमेशा उदाहरण प्राप्त होता है कि श्री शिवाय नमस्तुभ्यं का जप सभी समस्याओं को हल करके ना केवल मनुष्यों को अपितु देवताओं ,दानव और गंधर्व को भी शांति और प्रसन्नता प्रदान करता है।

शिव पुराण में एक कथा आती है एक बहुत बड़े भक्त जिनका नाम नामदेव था एक ऐसे भक्त जो हमेशा जप में विलीन रहते हो , अपने कानों को केवल कथा का श्रवण करवाते हो अपनी नासिका को केवल शिव के अर्पित फूलों की गंध महसूस करवाते हो और मुख में हमेशा शिव का महामंत्र का जाप करते हो और केवल महाप्रसाद ही स्वीकार करते हो।

ऐसे महान भक्त अपनी दिनचर्या में एक समय शिव का प्रसाद बनाते वक्त, एक कुत्ता उनके रसोई घर में आकर रोटी मुंह में दबाकर भाग जाता है. उसके पीछे पीछे नामदेव जी भागते हैं।

उनके पड़ोसियों को लगता है कि शायद वह कुत्ते से रोटी छुड़वाने जा रहे हैं परंतु उन्हें भी अचरज होता है कि नामदेव जी अपने हाथ में भी कटोरी लेकर कुत्ते के पीछे क्यों भाग रहे हैं, तब कथा में वर्णन आता है कि नामदेव के ह्रदय में इतनी दया भरी हुई है कि वह चाहते हैं कि जो कुत्ता उनके घर से रोटी लेकर भागा है वह कुत्ता वह सूखी रोटी ना खाकर अपितु घी में लगी हुई रोटी का स्वाद ले।

शिव महापुराण में भी यह वर्णन आता है कि इस स्तर के दया का भाव केवल कुछ ही भक्तों में देखने को प्राप्त होता है , परंतु कलयुग में मनुष्य इस भाव के स्तर तक केवल श्री शिवाय नमस्तुभ्यं के जप करके ही प्राप्त कर सकता है।

श्री शिवाय नमस्तुभ्यं जब की प्रबलता इतनी है कि यह तुरंत मनुष्य को मन शांति को प्राप्त करवाता है।

श्री शिवाय नमस्तुभ्यं

अगर किसी भी समय हम शिव की पूजा अर्चना के दौरान अगर हम ह्रदय से यह चाहते हैं कि वह शिव स्वीकार करें तो हमें उस वक्त श्री शिवाय नमस्तुभ्यं का जप निरंतर करते रहना चाहिए।

इस दौरान हमें विशेष तौर पर यह ध्यान रखना चाहिए कि संपूर्ण भोग हम शिवलिंग के अग्रभाग पर ही अर्पित करें क्योंकि इस अग्रभाग पर स्वयं 33 कोटि देवी देवताओं का स्थान होता है और शिवलिंग के अग्रभाग पर भोग अर्पित करने का अर्थ है कि हमने शिव के साथ-साथ 33 कोटि देवी देवताओं को भी भोग अर्पित किया है, इस दौरान हमें विशेष तौर पर यह ध्यान रखना चाहिए कि कोई सा भी भोग का सामान हम जलाधारी में ना दें क्योंकि जलाधारी में स्वयं शिव जी की पत्नी पार्वती का निवास होता है और पार्वती जी का हस्त कमल सदैव यहां पर चिन्हित रहता है।

स्वयं माता पार्वती भी यह कहती है कि अगर शिव को प्राप्त करना है तो श्री शिवाय नमस्तुभ्यं का जप उसी प्रकार से महत्वपूर्ण है जिस प्रकार शरीर को प्राणवान बनाने के लिए प्राण वायु का होना आवश्यक है।

तो चलिए शिव को अपने ह्रदय में निवास करवा कर श्रद्धा पूर्वक के शिवाय नमस्तुभ्यं का जब हम निरंतर करते रहे।

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|| श्री शिवाय नमस्तुभ्यं ||

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