क्यों विनम्रता के होने पर ही शिव प्रसन्न होते हैं

क्यों विनम्रता के होने पर ही शिव प्रसन्न होते हैं

Posted by

क्यों विनम्रता के होने पर ही शिव प्रसन्न होते हैं?

जिस प्रकार से किसी दानव ने पृथ्वी पर त्राहि-त्राहि मचा दी हो और कोई भी अस्त्र-शस्त्र उसे मारने में सक्षम ना हो तो अंत में ब्रह्मास्त्र उपयोग करना ही उचित होता है उसी प्रकार से भक्ति में भी विनम्रता का होना अति आवश्यक है।

श्रीमद्भागवत में भी यह उल्लेख आता है कि चाहे कोई भक्त साधना में कितना ही क्यों ना उन्नत हो, हो सकता हो कि वह अपना जप बहुत अच्छे से करता हो यहां तक की पूजा अर्चना में भी उसकी कोई त्रुटि ना होती हो, परंतु अगर उसमें विनम्रता का भाव नहीं है तो उसकी सारी साधना का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

पुराणों में और श्रीमद्भागवत में भी ऐसे कई उल्लेख आते हैं जो हमें इसका स्पष्टीकरण देते हैं, जिस प्रकार से प्रहलाद के आह्वान पर नरसिंह भगवान खुद प्रकट होते हैं , इसका सबसे मुख्य कारण यह है कि प्रहलाद की भक्ति में इतनी विनम्रता थी और इस विनम्रता के बल पर ही हूं ने भगवान की असीम कृपा प्राप्त हुई।

जिस प्रकार से पुष्प का कर्म होता है कि वह वातावरण में सुगंध फैलाएं, उसी प्रकार से एक भक्तों का भी है कर्तव्य होता है कि वह विनम्रता को साथ लेकर अपनी भक्ति में प्रगति करें।

स्कंद पुराण में यह वर्णन आता है कि किस प्रकार से नारायण को सत्यनारायण कहा जाता है, एक समय की बात है जब यह द्वंद फैल जाता है कि विष्णु बड़े हैं या ब्रह्मा।

इसी पहेली को सुलझाने का निर्णय शिव अर्थात भोलेनाथ करते हैं , और शिव ब्रह्मा और विष्णु से कहते हैं कि जो भी उनके द्वारा दिए गए कार्य को संपन्न करेगा वह महान होगा।

इसमें ब्रह्मा को यह कार्य दिया जाता है कि वह शिवलिंग के सबसे अग्रभाग को ढूंढे।

और वही विष्णु को यह कार्य दिया जाता है कि वह शिवलिंग के सबसे निचले भाग को ढूंढें , परंतु जब समय अवधि की घोषणा होती है और समय बीत जाने के बाद भी कोई नतीजा नहीं होता, तब शंकर विष्णु से पूछते हैं कि क्या आप सफल हुए तब विष्णु कहते हैं कि वह असफल रहे।

यह सत्य कहने के कारण नारायण का नाम सत्यनारायण हुआ।

पुराणों में भी कई बार वर्णन आता है कि जिस प्रकार से प्रकृति को निहारने के लिए हमें दोनों नेत्रों की आवश्यकता है,

उसी प्रकार से अगर भक्तों यह चाहता है कि वह भक्ति के सर्वोत्तम स्तर पर जाएं तो यह तभी संभव है जब उसमें विनम्रता का भाव हो क्योंकि विनम्रता का भाव ही मनुष्य में यह ज्ञान उत्पन्न करता है कि वह गुरु के सानिध्य में विनम्रता से और उनसे दया की भीख मांगे जिससे वह अपनी भक्ति में प्रगति कर सकें।

विनम्रता का भाव जब भगवान भक्त में देखते हैं तो वह भक्तों से बहुत अधिक प्रसन्न हो जाते हैं क्योंकि भगवान भी जानते हैं कि जिस भक्तों में विनम्रता का भाव उत्पन्न हो चुका है उसमें किसी भी प्रकार का लोभ ,लालच ,ईर्ष्या और द्वेष की कोई संभावना नहीं रहती।

मानो उसका ह्रदय इतना पवित्र और पावन हो जाता है कि स्वयं भगवान उस में निवास करते हैं।

क्योंकि भगवान भी ऐसे भक्तों से बिछड़ना नहीं चाहते जो उनसे इतना अधिक प्रेम करता हो।

भक्तों की हमेशा यह आशा होती है कि वह नवधा और प्रेमा भक्ति के स्तर को छू पाए, क्योंकि यह भक्ति के वह स्तर है जिसको पा लेने के बाद मनुष्य को को किसी भी सांसारिक वस्तुओं की इच्छा नहीं होती। उसे तो केवल और केवल भगवान के चरण कमलों में रहने की ही इच्छा होती है।

विनम्रता का सबसे अच्छा उदाहरण तो हमें स्वयं प्राकृतिक प्रकृति सिखाती है।

जिस प्रकार से हम जानते हैं कि जो वृक्ष तेज आंधी में झुकते नहीं है वह जड़ सहित उखड़ जाते हैं और जिन वृक्षों में विनम्रता के कारण झुकाव होता है वह तेज आंधी और बारिश को भी सहन कर जाते हैं।

इसलिए अगर भक्तों इस मृत्यु लोक से छुटकारा पाकर परम गति को प्राप्त करना है तो उसमें विनम्रता का गुण होना अति आवश्यक है।

अगर आपको यह लेख पसंद आया तो इसे ज्यादा से ज्यादा लोगो को शेयर करे।

यह भी पढ़े:

ईश्वर से प्रेम कैसे किया जाता है

श्री शिवाय नमस्तुभ्यं मंत्र की महिमा

पंडित प्रदीप जी मिश्रा का जीवन परिचय

कावड़ के जल से ये उपाय जरूर करें

भोले बाबा से हमें क्या प्रार्थना करना चाहिए

शीतला सप्तमी पर भूल के भी ना करे ये काम

क्यों शिव को कहा जाता है देवादि देव महादेव

शिव को किस प्रकार प्रसन्न करें

हर समस्या का हल – पंडित प्रदीप जी मिश्रा

घर में क्यों होना चाहिए शिवलिंग – शिवलिंग की महिमा

जानिए रुद्राक्ष के महत्व एवं मंत्र(1-14 मुखी रुद्राक्ष)

|| श्री शिवाय नमस्तुभ्यं ||

श्री शिवाय नमस्तुभ्यं

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *